
इल्ज़ाम, सियासत और मिम्बरे रसूल (सल्ल.) : गोहलपुर ईदगाह विवाद पर समाज में फिक्र
“जबलपुर मुस्लिम समाज को सबसे बड़ा खतरा नई या पुरानी कमेटी से नहीं… बल्कि उस दिन से है, जब मिम्बरे रसूल (सल्ल.) से कही गई बातों को लोग दीन नहीं, सियासत समझने लगेंगे।”
मुस्लिम समाज की मजहबी और सामाजिक विरासतें सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि पूरी कौम की पहचान, भरोसे और तहज़ीब की निशानी हैं। ईदगाह और मस्जिदें हमेशा से समाज को जोड़ने और इंसाफ का पैगाम देती आई हैं। लेकिन जब इन मुकद्दस जगहों पर ठीक नमाज के समय सियासत, गुटबाज़ी और आरोपों का माहौल बन जाए, तो मामला सिर्फ किसी कमेटी का नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज की मजहबी संजीदगी और मुस्तकबिल का सवाल बन जाता है।
बाज मीडिया, जबलपुर। मोमिन ईदगाह गोहलपुर में पिछले दो मौकों पर ईद की नमाज़ के दौरान जिस तरह नमाज के पाक लम्हों और मिम्बरे रसूल (सल्ल.) का इस्तेमाल.. आरोप लगाने, आरोप का जवाब देने, अधूरे सच पेश करने और विरोधियों पर निशाना साधने के लिए हुआ, उसने समाज के एक बड़े तबके को बेचैन कर दिया है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर किसी कमेटी या पुराने मैनेजमेंट में भ्रष्टाचार, गड़बड़ी या आर्थिक अनियमितता हुई है, आपके पास सबूत हैं, कार्यवाही कीजिये। ईदगाह के हिसाब का भरोसेमंद संस्था से ऑडिट कराईये। ईओडब्ल्यू में शिकायत कीजिये। एफआईआर और ईदगाह के पैसे की रिकवरी कीजिये।
यह सब करना ‘नई कमेटी का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी। समाज भी हर वैधानिक जांच और ईमानदार कार्रवाई में नई कमेटी का साथ देगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या ईद की नमाज़, दुआ और इबादत के वक्त को राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप का मंच बनाया जाना सही है?
“मिम्बरे रसूल से इंसाफ और इस्लाह की बात होनी चाहिए… अगर वहीं से सियासी जंग लड़ी जाने लगे, तो समाज अपनी रूहानी मरकज़ियत खो देगा।”
नमाज़ का वक्त इबादत का है, सियासत का नहीं
भाजपा के युवा नेताओं से सजी नई कमेटी को समझना होगा .. ईद की नमाज़ केवल एक मजहबी रस्म नहीं होती। यह वह मुकद्दस वक्त होता है, जब हजारों लोग वुज़ू की हालत में अल्लाह के सामने खड़े होते हैं। ईदगाह में दाखिल होने से लेकर रुख्सती तक का हर लम्हा इबादत माना जाता है।
ऐसे लम्हों में पहली सफ में आकर, ज-नमाज पर खड़े होकर, खुतबे के माईक से आरोप प्रत्यारोप लगाए जाएं, अधूरे सच को जिक्र ओ अजकार कर रहे नमाजियों को सुनाया जाए, नमाज खड़ी होने के ठीक पहले के लम्हों को विरोधियों पर लान तान के लिये इस्तेमाल किया जाए… तो यह सिर्फ एक भाजपा नेता का “भाषण” नहीं रह जाता, बल्कि मिम्बरे रसूल (सल्ल) की अजमत और इबादत के पाक लम्हों के तकद्दुस पर भी सवाल खड़े करता है।
ईद की नमाज़ अल्लाह के सामने झुकने का वक्त है… अगर उसी वक्त सियासी तकरीरें होने लगें, तो इबादत की रूह मुतास्सिर होती है।
समाज के बुजुर्गों और समझदार तबकों का मानना है कि अगर यह परंपरा एक बार स्थापित हो गई, तो आने वाले समय में हर नई कमेटी अपने विरोधियों को जवाब देने के लिए ईदगाह की नमाज और मिम्बर का इस्तेमाल करेगी। जिसका खामियाजा यह होगा, धीरे-धीरे मिम्बरे रसूल की अहमियत कम होती जाएगी और वहां से कही जाने वाली बातों का असर भी खत्म हो जाएगा।
आज जो बातें कुछ लोगों को “जोशीला जवाब” या “मास्टर कार्ड” लग रही हैं, वही कल समाज में इबादत के मकाम और मिम्बर के राजनीतिक दुरुपयोग की रास्ता बन सकती हैं।
“आज अगर मिम्बर से सियासी जवाब दिए जाएंगे, तो कल हर गुट मिम्बरे रसूल को अपनी ताकत दिखाने का जरिया बना लेगा।”
जांच कराइए, रिपोर्ट पेश कीजिए… लेकिन तरीका शरीयत और तहज़ीब के मुताबिक हो
समाज के जिम्मेदार लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर नई कमेटी के पास पुराने प्रबंधन के खिलाफ दस्तावेज, सबूत और आर्थिक गड़बड़ी के प्रमाण हैं, तो उन्हें खुलकर सामने लाना चाहिए। स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। जरूरत पड़े तो ईओडब्ल्यू और थाने में शिकायत की जाए। दोषियों से रिकवरी की जाए।
“अगर गबन हुआ है तो कानून मौजूद है, जांच के इदारे मौजूद हैं… लेकिन मजहबी मंचों को इल्ज़ाम-तराशी का अड्डा बनाना किसी मसले का हल नहीं।”
यह सब कानूनी और नैतिक दायरे में पूरी तरह जायज है।
ईद की नमाज के दौरान मिम्बरे रसूल के माईक से ईदगाह कमेटी के बड़े फैसलों को सुनाया जा सकता है— “हमने से जांच कराई है, यह रही रिपोर्ट, और अब आगे यह कार्रवाई की जाएगी।”
लेकिन नमाज़ के दौरान खड़े होकर विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले करना, गीबत और चुगलखोरी जैसे अंदाज़ में बातें रखना, अधूरा सच पेश करना और भीड़ की भावनाओं को भड़काने की कोशिश करना — इसे समाज का बड़ा तबका एक गलत और घटिया रवैया मान रहा है।
“मस्जिद, ईदगाह और मिम्बर कौम को जोड़ने के लिए होते हैं… अगर वहीं से तफरका शुरू हो जाए, तो नुकसान पूरी नस्लों तक जाता है।”
समाज को तय करना होगा सीमा रेखा
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन सी कमेटी सही है और कौन गलत। असली सवाल यह है कि क्या समाज अपनी मजहबी विरासतों की हिफाज़त के लिए कोई नैतिक सीमा (इखलाकी हुदूद) रेखा तय करेगा?
क्या हम यह मानने को तैयार हैं कि—
- जांच होगी.. लेकिन इबादत के वक्त नहीं।
- जवाबदेही होगी.. लेकिन मिम्बरे रसूल की अजमत बचाकर।
- कार्रवाई होगी.. लेकिन मजहबी जज़बात का इस्तेमाल किए बिना।
- विरोध होगा.. लेकिन तहज़ीब और शरीयत के दायरे में।
अगर यह सीमाएं तय नहीं हुईं, तो आने वाले वर्षों में मस्जिदों, ईदगाहों और दरगाहों के मिम्बर और नमाज का वक्त भी राजनीतिक भाषणों और गुटीय लड़ाइयों के मरकज बन सकते हैं।
यह समय अहतिसाब का है …
“सबसे बड़ा खतरा किसी कमेटी से नहीं… बल्कि उस दिन से है, जब मिम्बरे रसूल (सल्ल.) से कही गई बातों को लोग दीन नहीं, सियासत समझने लगें।”
मोमिन ईदगाह का विवाद केवल एक संस्था का विवाद नहीं है। यह पूरे समाज के लिए एक आईना है। यह दिखाता है कि जब जवाबदेही खत्म होती है, नेतृत्व तानाशाह (पुरानी कमेटी) बनता है, समाज खामोश रहता है और मजहबी मंच सियासी हथियार (नई कमेटी) बन जाते हैं — तब विवाद केवल प्रशासनिक नहीं रहता, वह सामाजिक और रूहानी संकट में बदल जाता है।
इसलिए जरूरत इस बात की है कि समाज अपनी मजहबी विरासतों को बचाने के लिए सामूहिक समझदारी दिखाए। जांच और इंसाफ की मांग भी हो, लेकिन उस अंदाज़ में हो जो मजहबी मंचों की गरिमा और इबादत की पवित्रता को कायम रख सके।
क्योंकि अगर मिम्बरे रसूल भी सियासी लड़ाइयों का हिस्सा बन गया, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी कमेटी या गुट का नहीं होगा — बल्कि उस रूहानी एहतराम का होगा, जो सदियों से मुस्लिम समाज की असली ताकत रहा है।
BAZ MEDIA EDITORIAL: बाज मीडिया का साफ़ मानना है कि मोमिन ईदगाह में गुज़िश्ता 20 सालों के तमाम माली हिसाब-किताब का एक शफ़्फ़ाफ़ और गैरजानिबदार ऑडिट कराया जाए, और उसकी पूरी तफ़सील ‘किताब या रिपोर्ट’ की शक्ल में कम से कम 1 हजार कापी अवाम में बांटी जाए । अगर किसी भी दर्जे पर भ्रष्टाचार, गबन या माली बदउनवानी साबित होती है, तो ईदगाह की रकम की फ़ौरन रिकवरी हो। ज़रूरत पड़ने पर एफआईआर दर्ज कराकर कानूनी रास्ते से भी वसूली अमल में लाई जाए।
लेकिन खुदा के लिए, ईदैन की नमाज़ जैसे पाक और मुकद्दस लम्हात को इल्ज़ाम-तराशी, सियासी बयानबाज़ी और आपसी तनाज़े का मैदान न बनाया जाए। मिम्बर-ए-रसूल ﷺ की अजमत और वक़ार हर हाल में बरक़रार रहना चाहिए।
.. अगर कमेटी या किसी भी फ़रीक़ को अपने ऊपर लगे इल्ज़ामात का जवाब देना है, तो उसके लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करें, अवामी जलसा रखें, दस्तावेज़, किताबचे और फोल्डर शाया करके समाज के सामने अपना (पक्ष) रखें— मगर इबादतगाहों और इबादत के मुकद्दस मौक़ों को सियासत और तकरार से महफ़ूज़ रखा जाए। यही दीन की रूह है, यही उम्मत की भलाई और इत्तेहाद का रास्ता भी।



