दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 दंगों में मुस्लिम युवक की हत्या के दोषियों को 7 साल जेल बरकरार रखी

नई दिल्ली | BAZ News Network (BNN) । 2020 दिल्ली दंगों में 22 साल के मुस्लिम युवक मोनिश को पीटकर मार डालने वाले 5 लोगों को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को उनकी 7 साल जेल की सजा बरकरार रखी। अदालत ने साफ कहा कि ये लोग सिर्फ भीड़ में खड़े नहीं थे — बल्कि हथियारबंद टोली के सबसे आगे थे।
News in Short
- जस्टिस मधु जैन ने अमन कश्यप, देविंदर कुमार, प्रदीप राय, आशीष और अरुण कुमार की अपील खारिज की
- मोनिश को 25 फरवरी 2020 को चांद बाग इलाके में भीड़ ने घेरकर पीटा था
- पुलिस बैरिकेड के पास गिरने के बाद भी हमला जारी रहा, युवक की अस्पताल में मौत हो गई
- ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2024 में दोषियों को सजा सुनाई थी, हाईकोर्ट ने पुष्टि की
- दोषियों ने गवाहों की पहचान और जांच में खामियों का हवाला दिया था
भीड़ के सबसे आगे थे दोषी — हाईकोर्ट
जस्टिस मधु जैन ने अपने फैसले में लिखा कि मोनिश का पीछा किया गया, उसे घेरा गया और पुलिस बैरिकेड के पास गिर जाने के बाद भी मारपीट जारी रही। “भीड़ के पास हथियार थे और लगातार हमला हो रहा था — इससे साबित होता है कि उनका मकसद गंभीर चोट पहुंचाना था,” अदालत ने कहा। हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि जब गैरकानूनी जमावड़े की सदस्यता साबित हो जाए तो जानलेवा चोट किसने लगाई — यह पहचानना जरूरी नहीं। IPC की धारा 149 के तहत सभी दोषी माने जाते हैं।
मोनिश कौन था और कैसे हुई हत्या
मोनिश उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का रहने वाला था। दिहाड़ी मजदूरी करता था और करीब 10 साल से मुस्तफाबाद इलाके में रह रहा था। 25 फरवरी 2020 को चांद बाग के पीर बाबा मजार के पास एक भीड़ ने उसे पकड़ लिया। उसे पीटते हुए गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, सिर पर लगी चोटों से दिमाग में गंभीर चोट लगी और शॉक से मौत हुई। ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर 2024 को पांचों को दोषी करार दिया। 13 जनवरी 2025 को उन्हें हथियारबंद दंगा करने के लिए 1 साल सादा कारावास और हत्या के लिए 7 साल सख्त कैद की सजा मिली। साथ ही 30,000 रुपये जुर्माना।
दोषियों की दलीलें — हाईकोर्ट ने खारिज कीं
अपील में पांचों ने कहा था कि गवाहों के बयानों में विरोधाभास है, टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं हुई और जांच में कमियां थीं। लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इलाके में तैनात बीट कॉन्स्टेबल ने पांचों को पहचाना था। “वो पहले से इन्हें जानता था क्योंकि ड्यूटी के दौरान इनसे सामना हुआ था,” कोर्ट ने कहा। हेड कॉन्स्टेबल और दूसरे सिपाहियों ने भी मोनिश के पीछा, हमला और पुलिस के हस्तक्षेप की पुष्टि की। “पुलिस अधिकारियों की गवाही सिर्फ उनकी वर्दी के कारण खारिज नहीं की जा सकती,” कोर्ट ने जोड़ा। ड्यूटी रजिस्टर से उनकी मौजूदगी साबित होती है।
हाईकोर्ट ने पांचों की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। 2020 दिल्ली दंगों में हुई हिंसा के मामलों में यह एक और अहम फैसला है, जो साबित करता है कि भीड़ में शामिल हर शख्स जिम्मेदार है।
📌 Sources & References
- Live Law
- Maktoob Media



