
“घर से यह कहकर निकले थे कि बच्चों के दाखिले की फीस का इंतजाम करना है… लेकिन वापस आए तो लाश बनकर।”
यह दर्द पता अंसार नगर मदरसा वाली गली निवासी मोहम्मद अकबर अंसारी की बेवा नीलो अंसारी का है। अकबर के पिता का नाम मोहम्मद फैज़ अंसारी है। जिस पति के साथ मिलकर नीलो अपने तीन बच्चों के भविष्य के सपने देख रही थीं, गुरुवार को एक जर्जर सरकारी इमारत ने उन सपनों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया।
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अकबर अपने पीछे पत्नी नीलो अंसारी और तीन मासूम बच्चों को छोड़ गए हैं। उनके दो बेटे हैं—एक की उम्र 12 साल और दूसरे की 8 साल। उनकी एक बेटी महज 2 साल की है।

अब इस परिवार की आंखों में आंसू हैं और सामने एक बड़ा सवाल—आखिर अकबर की मौत का जिम्मेदार कौन है?
अकबर, गुरुवार को राइट टाउन स्थित टेलीकॉम फैक्ट्री परिसर में मौजूद जर्जर भवन को तोड़ने के काम में मजदूर के तौर पर गया था। बताया गया कि यह काम अधिकारियों के आदेश और निरीक्षण के बीच चल रहा था। इसी दौरान अचानक भवन की एक दीवार भरभराकर अकबर के ऊपर आ गिरी। मलबे में दबने से उसकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई।
हादसे के बाद परिवार को खबर तक नहीं मिली
परिवार का आरोप है कि हादसे के तुरंत बाद परिसर को सील कर दिया गया। कुछ लोग अकबर के घर पहुंचे और उसका आधार कार्ड अपने साथ ले गए, लेकिन परिवार को हादसे की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। परिजनों को घटना की जानकारी बाद में व्हाट्सऐप पर चल रही खबरों के जरिए मिली।
रात में जब अकबर का शव घर पहुंचा तो परिवार की चीख-पुकार से माहौल गमगीन हो गया। खून से लथपथ शव देखकर पत्नी नीलो और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है।

एक तरफ 12 और 8 साल के दो बेटे हैं, जिन्हें अभी अपने पिता की जरूरत थी… तो दूसरी तरफ महज 2 साल की मासूम बेटी है, जो शायद अभी यह भी नहीं समझ सकती कि उसके पिता अब कभी घर वापस नहीं आएंगे।
परिवार पिछले दो दिनों से इस सदमे से बाहर नहीं निकल पा रहा है कि आखिर उनके घर का कमाने वाला अचानक उनसे क्यों छीन लिया गया।
अगर इमारत सरकारी थी तो जिम्मेदारी किसकी?
क्षेत्र के युवा एसके फैज का कहना है कि अकबर किसी निजी जगह पर नहीं, बल्कि शहर को हादसे से बचाने के लिए एक जर्जर सरकारी इमारत को गिराने के काम में गया था।

उनका सवाल है—
“अकबर को जर्जर सरकारी इमारत को तोड़ने के लिए बुलाया गया था। अगर वही इमारत उनके ऊपर गिरकर उनकी जान ले ले तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या सरकारी विभाग की, मध्य प्रदेश सरकार की और जिला प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?”
परिवार ने मांगा 25 लाख रुपये मुआवजा
परिजनों का कहना है कि परिसर सरकारी था, संबंधित कंपनी सरकारी थी और भवन को गिराने का काम भी सरकारी आदेश और अधिकारियों की निगरानी में चल रहा था। ऐसे में काम के दौरान अकबर की मौत की जिम्मेदारी से सरकार और संबंधित विभाग बच नहीं सकते।
परिवार ने 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग उठाई है। साथ ही हादसे की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाने की मांग की जा रही है कि जर्जर भवन को गिराने से पहले सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए।
विधायक लखन घनघोरिया ने दिलाया मदद का भरोसा
पूर्व विधानसभा क्षेत्र के विधायक लखन घनघोरिया गुरुवार शाम पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। यहां उन्होंने पीड़ित परिवार को हर संभव मदद दिलाने के प्रयास का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा, “तत्काल आकस्मिक सहायता राशि जारी कराएंगे। इसी के साथ, अधिक से अधिक मुआवजा प्रदेश सरकार से मिल सके, इसके लिए भी प्रयास करेंगे।”
भाजपा नेता जमा खान अकबर के घर पहुंचे
इस दर्दनाक हादसे के बाद भाजपा नेता जमा खान गुरुवार शाम अकबर के घर पहुंचे और परिजनों से मुलाकात कर उन्हें न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करने का भरोसा दिया।
भाजपा नेता जमा खान ने कहा कि वह फैक्ट्री के जीएम से मुलाकात कर परिवार के लिए मुआवजे की मांग करेंगे। जरूरत पड़ी तो पीड़ित परिवार को साथ लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव से भी मुलाकात की जाएगी।
उन्होंने कहा कि अकबर के परिवार को न्याय दिलाने के लिए वह हरसंभव प्रयास करेंगे।
अब सिर्फ एक सवाल बाकी है…
अकबर तो चला गया। पीछे छोड़ गया अपनी पत्नी नीलो, 12 और 8 साल के दो बेटों और महज 2 साल की मासूम बेटी को।
पीछे रह गए उनके पिता मोहम्मद फैज़ अंसारी और एक ऐसा परिवार, जिसके सामने अब रोजमर्रा की जिंदगी भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।
वह घर से बच्चों की फीस का इंतजाम करने निकला था।
उसे क्या पता था कि जिस काम से वह अपने बच्चों का भविष्य संवारने जा रहा है, वही काम उसके बच्चों से उनका पिता छीन लेगा।
अब परिवार को सिर्फ मुआवजे का इंतजार नहीं है।
वह यह जानना चाहता है कि अकबर की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है?
क्या जर्जर सरकारी इमारत को गिराने से पहले सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए थे?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या इस दर्दनाक मौत के बाद किसी की जवाबदेही तय होगी?



