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वंदे मातरम बिल का विरोध — AIMPLB ने कहा धार्मिक आज़ादी पर हमला

नई दिल्ली | BAZ News Network (BNN) । ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने संसद से पास हुए वंदे मातरम बिल का कड़ा विरोध किया है। बोर्ड का कहना है कि इसे कानूनी तौर पर लागू करना धार्मिक आज़ादी और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है।

News in Short

  • AIMPLB ने Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 का विरोध किया
  • बोर्ड का कहना — वंदे मातरम में धार्मिक आस्था की बात, इसे ज़बरदस्ती लागू करना गलत
  • डॉ. एस.क्यू.आर. इलयास ने कहा — तौहीद के सिद्धांत के खिलाफ है मातृभूमि को देवी मानना
  • बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के Bijoe Emmanuel केस का हवाला दिया
  • AIMPLB ने सरकार से कहा — बेरोज़गारी, महंगाई जैसे मुद्दों पर ध्यान दो

AIMPLB ने क्यों किया वंदे मातरम बिल का विरोध

शुक्रवार को जारी बयान में बोर्ड ने कहा कि कानून के ज़रिए किसी धार्मिक आस्था को मानने के लिए मजबूर करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। AIMPLB के प्रवक्ता डॉ. एस.क्यू.आर. इलयास ने कहा कि संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद सिर्फ पहले दो पैराग्राफ को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया था। बाकी हिस्सों में धार्मिक आस्था की बात थी, जो देश के सेकुलर चरित्र से मेल नहीं खाती।

डॉ. इलयास ने साफ किया कि वंदे मातरम के कुछ हिस्सों में मातृभूमि को देवी के रूप में दिखाया गया है और उसकी पूजा की बात कही गई है। उन्होंने कहा, “यह तौहीद के सिद्धांत के बिल्कुल खिलाफ है। एक मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है। किसी ऐसी चीज़ में हिस्सा लेने को मजबूर नहीं किया जा सकता जो उसकी आस्था के खिलाफ हो।”

संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 का हवाला

बोर्ड ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार की आज़ादी देता है। वहीं अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है। इलयास ने कहा, “कोई भी नागरिक किसी नारे, गीत या विचारधारा में हिस्सा लेने को मजबूर नहीं किया जा सकता।”

बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के Bijoe Emmanuel vs State of Kerala केस का ज़िक्र किया। इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रगान जन गण मन के मामले में भी किसी को सज़ा नहीं दी जा सकती अगर वह सम्मानपूर्वक हिस्सा नहीं लेता और यह उसकी धार्मिक आस्था के खिलाफ है। कोर्ट ने माना था कि चुप रहना भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है।

देशभक्ति का पैमाना नारा नहीं, संविधान है

डॉ. इलयास ने कहा कि मुसलमान अपने देश से गहरा प्यार करते हैं और वतन से मोहब्बत को अपनी नागरिक और नैतिक ज़िम्मेदारी मानते हैं। लेकिन देशभक्ति और इबादत में फर्क है। उन्होंने कहा, “देश से प्यार और देश की पूजा दो अलग चीज़ें हैं। देशभक्ति का पैमाना संविधान के प्रति प्रतिबद्धता है, न कि कोई खास नारा या गीत।”

बोर्ड ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह बेरोज़गारी, महंगाई, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे ज़रूरी मुद्दों पर ध्यान दे। भावनात्मक और धार्मिक विवादों से जनता का ध्यान भटकाना न लोकतंत्र के हित में है, न राष्ट्र के।

AIMPLB ने कहा कि भारत तभी मजबूत होगा जब हर नागरिक को बराबर इज्जत, न्याय और आज़ादी मिले। देशभक्ति को धार्मिक आस्था के चश्मे से नहीं, बल्कि संविधान और मौलिक अधिकारों के संरक्षण से आंका जाए।

📌 Sources & References

  • Maktoob Media

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