BAZ UP: 33 साल पुराने देशद्रोह केस में 78 वर्षीय मोहम्मद नईम बरी

लखनऊ | BAZ News Network (BNN) । 33 साल की कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार इंसाफ मिला। लखनऊ की स्पेशल NIA कोर्ट ने 78 वर्षीय मोहम्मद नईम को देशद्रोह केस में बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि सरकारी वकील सबूत पेश करने में नाकाम रहे।
News in Short
- लखनऊ NIA कोर्ट ने 1993 के देशद्रोह केस में मोहम्मद नईम को बरी किया
- अदालत ने कहा काले झंडे कोर्ट में पेश नहीं किए गए, गवाह गायब
- मुख्य गवाह इंस्पेक्टर पवन कुमार सिंह जिरह के लिए कभी नहीं आए
- 33 साल बाद नईम बोले अब लोग देशद्रोही नहीं कहेंगे
- सह-आरोपी मोहम्मद यूसुफ और अताउल्लाह की मौत हो चुकी है
33 साल बाद मिली बरी, सबूतों में बड़ी खामियां
एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज उमाकांत जिंदल ने 31 जुलाई को फैसला सुनाया। गोरखपुर के इस्माइलपुर के रहने वाले नईम पर IPC की धारा 124A (देशद्रोह), 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस) और 153B (राष्ट्रीय एकता के खिलाफ) के तहत केस था। गोरखपुर के कोतवाली थाने में 1993 में केस दर्ज हुआ था।
अदालत ने पाया कि मौके से बरामद काले झंडे कभी कोर्ट में पेश नहीं किए गए। जब्ती का कोई पक्का मेमो भी नहीं था। कांस्टेबल दुर्विजय सिंह ने क्रॉस एग्जामिनेशन में माना कि पुलिस पहुंचने से पहले ही लोग भाग गए थे।
गवाह नहीं आए, इंस्पेक्टर ने जिरह से बचा लिया
सबसे बड़ी बात यह कि शिकायतकर्ता इंस्पेक्टर पवन कुमार सिंह सिर्फ मुख्य गवाह के तौर पर आए। क्रॉस एग्जामिनेशन के लिए कई मौके मिले लेकिन कभी पेश नहीं हुए। दूसरे जांच अधिकारी ने भी माना कि उन्होंने मौके पर जाकर कोई जांच नहीं की। पहले अधिकारी के जमा किए गए सबूतों के आधार पर चार्जशीट फाइल कर दी।
अदालत ने सवाल किया कि जब खुद सरकारी गवाह कह रहे हैं कि आरोपी पुलिस आने से पहले भाग गए तो फिर नईम और बाकियों की शिनाख्त कैसे हुई? कोई स्वतंत्र गवाह भी पेश नहीं किया गया जो नईम को वहां मौजूद बताता।
1993 में गणतंत्र दिवस पर क्या था आरोप
सरकारी वकील के मुताबिक 26 जनवरी 1993 को तत्कालीन कोतवाली इंस्पेक्टर पवन कुमार सिंह गश्त पर थे। उन्होंने इस्माइलपुर इलाके में काले झंडे लहराते लोग देखे। आरोप था कि “पाकिस्तान जिंदाबाद” और “रिपब्लिक डे मुर्दाबाद” के नारे लगाए जा रहे थे।
FIR में यह भी कहा गया कि आरोपियों ने बाबरी मस्जिद विध्वंस का जिक्र करते हुए भारत में “एक और पाकिस्तान” बनाने की बात की। पुलिस ने दावा किया कि आरोपी गिरफ्तारी से पहले भाग गए और मौके से चार काले झंडे बरामद हुए। बाद में मोहम्मद नईम, मोहम्मद यूसुफ, अताउल्लाह और दूसरों को आरोपी बनाया गया।
जांच सालों तक अटकी, सह-आरोपियों की मौत
नईम के वकील राहुल सोनकर के मुताबिक जांच सालों तक लटकी रही। पहले जांच अधिकारी ने 2003 में फाइनल रिपोर्ट दी कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। लेकिन जब रिपोर्ट स्वीकार नहीं हुई तो दूसरे अधिकारी ने 2005 में बिना नए सबूत जुटाए चार्जशीट फाइल कर दी।
सुनवाई के दौरान सह-आरोपी मोहम्मद यूसुफ और अताउल्लाह की मौत हो गई। नईम अकेले ही ट्रायल का सामना करते रहे।
“अब मुझे देशद्रोही नहीं कहेंगे। 33 साल से मैं सबको समझा रहा था कि मैं बेकसूर हूं। आज इंसाफ मिला,” नईम ने फैसले के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा। अदालत ने नईम को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उनके जमानती बॉन्ड रद्द कर दिए। CrPC की धारा 437A के तहत वैधानिक बॉन्ड छह महीने के लिए लागू रहेगा।
📌 Sources & References
- The Observer Post
- Times of India



