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इलाहाबाद HC का फैसला: सरकारी प्रोजेक्ट के लिए मस्जिद ले सकती है सरकार

प्रयागराज | BAZ News Network (BNN) । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि Places of Worship Act 1991 सिर्फ धार्मिक स्थलों का conversion रोकता है। सरकार को सार्वजनिक प्रोजेक्ट के लिए मस्जिद या मंदिर का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता। वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर प्रोजेक्ट के तहत छह पुरानी मस्जिदों को तोड़ने की योजना को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई।

News in Short

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा Places of Worship Act धार्मिक बदलाव रोकता है, अधिग्रहण नहीं
  • वाराणसी दलमंडी इलाके की छह ऐतिहासिक मस्जिदों का अधिग्रहण चुनौती खारिज
  • काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने संपत्ति का अधिग्रहण किया
  • किरायेदार दुकानदारों की याचिका कोर्ट ने खारिज की, कहा उनके पास locus standi नहीं
  • कोर्ट ने कहा वक्फ बोर्ड और मुतवल्ली को अधिकार है, किरायेदारों को नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: मस्जिद अधिग्रहण कानूनी

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने साफ किया कि 1991 का कानून सिर्फ धार्मिक character बदलने से रोकता है। एक धर्म की इबादतगाह को दूसरे धर्म में convert नहीं किया जा सकता। लेकिन सड़क, infrastructure या किसी सार्वजनिक विकास के लिए सरकार किसी भी धार्मिक स्थल को acquire कर सकती है। Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा, “Act of 1991 सिर्फ conversion रोकता है, राज्य की authority को कम नहीं करता।”

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दलमंडी इलाके के छह किरायेदार और दुकानदारों ने याचिका दायर की थी। उन्होंने छह मस्जिदों — अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रज़ा खान, मस्जिद करीमुल्लाह बेग, मस्जिद निसारान और मस्जिद संगमरमर — को तोड़ने से रोकने की गुजारिश की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ये मस्जिदें 15 अगस्त 1947 से पहले की हैं, इसलिए Places of Worship Act के तहत संरक्षित हैं।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट का विवाद

उत्तर प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2021 में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर inaugurate किया था। यह 400 मीटर चौड़ा कॉरिडोर है जो काशी विश्वनाथ मंदिर को गंगा नदी से जोड़ता है। इस redevelopment प्रोजेक्ट में infrastructure और सुविधाओं का विस्तार किया गया है ताकि तीर्थयात्रियों को बेहतर अनुभव मिले।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि अधिग्रहण से उनकी रोजी-रोटी, आश्रय और इबादत का अधिकार छिन जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रोजेक्ट खास समुदाय को निशाना बना रहा है। कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता सिर्फ किरायेदार हैं, मालिक नहीं। इसलिए उन्हें acquisition proceedings को चुनौती देने का अधिकार (locus standi) नहीं है।

वक्फ बोर्ड और मुतवल्ली के हाथ में अधिकार

कोर्ट ने कहा कि ये मस्जिदें रजिस्टर्ड वक्फ संपत्ति हैं। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संबंधित मुतवल्लियों और वक्फ बोर्ड की है। कोर्ट ने Places of Worship Act की धारा 3 और 4 की व्याख्या करते हुए कहा कि यह कानून 15 अगस्त 1947 को जैसे धार्मिक स्थल थे, उनके religious character को preserve करने के लिए बना था। यह सरकार की sovereign power को रोकने के लिए नहीं बना, बशर्ते सरकार उचित मुआवजा दे।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के M. Ismail Faruqui v. Union of India फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए मस्जिद का अधिग्रहण संवैधानिक रूप से वर्जित नहीं है।

याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने साफ किया कि यह टिप्पणियां राज्य सरकार, वक्फ बोर्ड और मुतवल्लियों के कानूनी अधिकारों पर कोई असर नहीं डालेंगी। अगर जरूरत पड़े तो वे उचित कानूनी उपाय कर सकते हैं।

📌 Sources & References

  • maktoobmedia.com
  • Live Law

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