
जबलपुर। किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों से नहीं होती, बल्कि उन लोगों से होती है जो अपनी पूरी जिंदगी उस संस्था को बेहतर बनाने में लगा देते हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम है डॉ. शकील अहमद अंसारी का, जिन्होंने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की सेवा में पूरे 40 वर्ष समर्पित करने के बाद सेवानिवृत्ति ले ली।

विदाई समारोह में मौजूद हर व्यक्ति के चेहरे पर भावुकता थी। कुलसचिव डॉ. सुरेन्द्र सिंह, विभागाध्यक्ष, अधिकारी, कर्मचारी और परिजन इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने। लेकिन यह विदाई केवल एक कर्मचारी की नहीं थी, बल्कि उस शख्सियत की थी जिसने चार दशक तक हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुस्लिम समाज में डॉ. शकील अंसारी को केवल एक विश्वविद्यालय अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा आंदोलन (EDUCATION MOVEMENT) के एक लीडर के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें आज के दौर का “जबलपुर का सर सैय्यद” कहकर याद करता है।

जब समाज स्कूल भेजने से डरता था, तब उन्होंने कॉलेज का रास्ता दिखाया
आज जब उच्च शिक्षा सामान्य बात लगती है, तब शायद नई पीढ़ी यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि एक दौर ऐसा भी था जब मुस्लिम समाज के अनेक परिवार अपने बच्चों को स्कूल तक भेजने में हिचकिचाते थे। कॉलेज और विश्वविद्यालय की पढ़ाई तो बहुत दूर की बात थी।
उसी दौर में डॉ. शकील अंसारी ने शिक्षा को अपना मिशन बनाया।
उन्होंने केवल भाषण नहीं दिए, बल्कि घर-घर जाकर लोगों को समझाया कि पढ़ाई ही समाज की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने सैकड़ों छात्रों का कॉलेज में प्रवेश कराया, प्रवेश प्रक्रिया समझाई, दस्तावेज पूरे करवाए, फीस, छात्रवृत्ति और विश्वविद्यालय की औपचारिकताओं में मदद की तथा पढ़ाई पूरी होने तक उनका मार्गदर्शन किया।
प्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों छात्र उनके सहयोग से उच्च शिक्षा तक पहुंचे, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से हजारों विद्यार्थियों के लिए उन्होंने ऐसे रास्ते बनाए जिनका लाभ आज भी समाज उठा रहा है।
ज्यादा वेतन वाली नौकरी छोड़ी, भविष्य बनाने का रास्ता चुना
युवावस्था में डॉ. शकील अंसारी का चयन तत्कालीन मध्य प्रदेश विद्युत मंडल में अच्छी तनख्वाह वाली सरकारी नौकरी के लिए हो चुका था। आर्थिक रूप से वह नौकरी कहीं अधिक आकर्षक थी।
इसी दौरान रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से नियुक्ति का अवसर मिला।
उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अधिक वेतन वाली नौकरी छोड़कर विश्वविद्यालय का रास्ता चुना।
उनका मानना था कि बेहतर वेतन से ज्यादा महत्वपूर्ण वह काम है, जिससे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तैयार हो सके।
वे अक्सर कहा करते थे कि यदि विश्वविद्यालय में रहेंगे तो समाज के बच्चों को उच्च शिक्षा तक पहुंचाने में अधिक मदद कर पाएंगे। समय ने साबित किया कि उनका यह निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी ऐतिहासिक साबित हुआ।
समय पर परीक्षा और परिणाम… यही बनी पहचान
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की गोपनीय (परीक्षा) शाखा में अधीक्षक के रूप में डॉ. शकील अंसारी ने लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाई। उनकी प्राथमिकता हमेशा स्पष्ट रही—समय पर परीक्षा, समय पर परिणाम और पूरी परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता।

विश्वविद्यालय में परीक्षा सुधार (Exam Reforms) की चर्चा जब भी होती है, उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
उनके विदाई समारोह में कुलसचिव डॉ. सुरेन्द्र सिंह ने भी परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने में उनके योगदान की खुले दिल से सराहना की।
खुद भी पढ़ते रहे, दूसरों को भी पढ़ाते रहे
डॉ. शकील अंसारी का मानना था कि शिक्षा कभी समाप्त नहीं होती।
नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
उन्होंने स्नातकोत्तर (Post Graduation) शिक्षा प्राप्त की, फिर पीएचडी की उपाधि हासिल की। इसके बाद एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और पत्रकारिता की डिग्री भी प्राप्त की।
उनकी जिंदगी इस बात की मिसाल बन गई कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
समाज के लिए संस्थान खड़े किए
डॉ. शकील अंसारी ने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना।
वे चाहते थे कि मुस्लिम समाज का हर बेटा और हर बेटी उच्च शिक्षा तक पहुंचे।
समाज में शिक्षा का वातावरण बनाने के लिए उन्होंने अनेक शैक्षणिक संस्थानों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ईडब्ल्यूएस स्कूल को मजबूत करने वाले प्रमुख लोगों में उनका नाम लिया जाता है। फारान संस्थान को खड़ा करने में उन्होंने अहम जिम्मेदारी निभाई। हुसैनिया संस्थान को गोहलपुर तक लाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिससे क्षेत्र की बेटियों को दूर जाकर पढ़ाई करने की मजबूरी कम हुई।
इसके अलावा भी वे दशकों तक अनेक सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े रहे। जहां भी अवसर मिला, उन्होंने लोगों को अपने बच्चों, विशेष रूप से बेटियों की शिक्षा के लिए प्रेरित किया और केवल प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि उनके लिए रास्ते भी बनाए।
विरासत में मिला शिक्षा का मिशन
डॉ. शकील अंसारी की सोच अचानक नहीं बनी।
यह उन्हें अपने वालिद मरहूम जलील अंसारी से विरासत में मिली।
मरहूम जलील अंसारी भी रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में अधिकारी थे। आप मुस्लिम समाज में लड़कियों की शिक्षा के लिए स्थापित ईडब्ल्यूएस स्कूल की नींव रखने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रहे।
डॉ. शकील अंसारी ने अपने पिता के इस सपने को आगे बढ़ाया और शिक्षा को अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया।
अपने घर को भी बनाया शिक्षा की मिसाल
जो संदेश उन्होंने समाज को दिया, वही उनके अपने परिवार की पहचान भी बना।
उनकी तीनों बेटियां पीएचडी हैं और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दे रही हैं।
डॉ. फरहीन फिरदौस और डॉ. अमरीन फिरदौस ने माइक्रोबायोलॉजी में पीएचडी की है।
डॉ. नौशीन फिरदौस ने कॉमर्स विषय में पीएचडी की। हाल ही में उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की उपस्थिति में आयोजित दीक्षांत समारोह में डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई।
उनके सबसे छोटे बेटे साकिब अंसारी वर्तमान में मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) की तैयारी कर रहे हैं।
यह परिवार इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा की शुरुआत घर से होती है।
नौकरी से सेवानिवृत्ति, मिशन से नहीं
विश्वविद्यालय की नौकरी से डॉ. शकील अंसारी भले ही सेवानिवृत्त हो गए हों, लेकिन शिक्षा के प्रति उनका समर्पण आज भी पहले जैसा है।
उन्हें करीब से जानने वाले बताते हैं कि आज भी यदि किसी छात्र को प्रवेश, पढ़ाई या करियर को लेकर मार्गदर्शन चाहिए तो डॉ. शकील अंसारी हमेशा उपलब्ध हैं।
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय का एक कमरा जरूर खाली हुआ है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करता रहेगा।
पार्ट-2 में पढ़िए…
कैसे डॉ. शकील अंसारी ने जबलपुर के मुस्लिम समाज में उच्च शिक्षा की एक पूरी सोच विकसित की? ईडब्ल्यूएस, फारान, हुसैनिया और अन्य संस्थाओं के पीछे उनकी क्या भूमिका रही? और क्यों समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें “जबलपुर का सर सैय्यद” कहता है?




