
नई दिल्ली | 10 जून 2026 — BAZ News Network (BNN) | BAZ Desk | Bazmedia.in
News in Short
- रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने ट्रंप जूनियर से जुड़े टेक्सास रिफाइनरी स्टार्टअप में कम से कम $100 मिलियन लगाए।
- यह निवेश उस वक्त हुआ जब अमेरिका ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया था और रूसी तेल खरीदी पर दबाव था।
- निवेश के बाद भारत को टैरिफ में राहत, वेनेज़ुएला तेल का लाइसेंस और रूसी क्रूड पर सैंक्शन वेवर मिला।
रिलायंस ट्रंप निवेश का यह मामला अमेरिकी पत्रकारिता संस्था ProPublica की 9 जून की जांच में सामने आया है। मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने टेक्सास के एक गुमनाम रिफाइनरी स्टार्टअप — America First Refining — में कम से कम 10 करोड़ डॉलर लगाए। इस स्टार्टअप में डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की चुपचाप हिस्सेदारी थी।
रिलायंस ट्रंप निवेश: पूरा घटनाक्रम क्या है?
America First Refining का मकसद है — टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविले पर पिछले पचास साल में अमेरिका की पहली बड़ी नई रिफाइनरी बनाना। लेकिन अंबानी का पैसा आने से पहले यह प्रोजेक्ट लगभग मुर्दा पड़ा था। एक दशक से ज़्यादा वक्त से फंड जुटाने में नाकाम, बार-बार डेडलाइन चूकता और नाम बदलता रहा। ब्राउन्सविले पोर्ट के अधिकारी भी निजी तौर पर मान चुके थे कि प्रोजेक्ट खत्म हो गया।
कंपनी के संस्थापक जॉन काल्से पर एक वक्त आठ अलग-अलग कंपनियों के मुकदमे चल रहे थे। दिवालिया कार्यवाही भी हुई। कोर्ट के नियुक्त ट्रस्टी ने आरोप लगाया कि काल्से ने कंपनी की संपत्ति गलत तरीके से हटाई — जिसे काल्से ने बाद में नकारा।
नवंबर 2025 में ट्रंप जूनियर ने जामनगर का दौरा किया। अंबानी परिवार के प्राइवेट चिड़ियाघर का दौरा हुआ, अनंत अंबानी के साथ लोकनृत्य में भी शरीक हुए। इसके कुछ महीनों के भीतर America First Refining LLC के कागज़ात दाखिल हुए और रिलायंस का निवेश आ गया।
टैरिफ का दबाव और फिर राहत — संयोग या सौदा?
रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से रिलायंस पर सस्ते रूसी तेल की खरीदारी के आरोप लग रहे थे। ट्रंप प्रशासन ने अगस्त 2025 में भारत पर टैरिफ दोगुना कर 50 फीसद कर दिया। व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइज़र पीटर नवारो ने सीधे तौर पर कहा कि भारत की एनर्जी इंडस्ट्री को “पुतिन की जंग की फंडिंग बंद करनी होगी” — जिसे सीधे अंबानी पर निशाना माना गया।
फरवरी 2026 में अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील हुई और टैरिफ घटा। रिलायंस को वेनेज़ुएला का तेल खरीदने का अमेरिकी लाइसेंस मिला। ईरान संकट के बाद रूसी क्रूड पर सैंक्शन से छूट भी मिली। मार्च में खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने Truth Social पर अंबानी के इस निवेश की तारीफ की — “ज़बरदस्त निवेश।”
रिलायंस ने इस स्टार्टअप की वैल्यू 100 करोड़ डॉलर से ज़्यादा आंकी। नेशनल एनर्जी डॉमिनेंस काउंसिल ने विदेशी निवेशकों से मिलवाने में मदद की। कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक की फर्म Cantor Fitzgerald इस डील की फाइनेंशियल एडवाइज़र थी। टेक्सास के रेगुलेटर्स ने भी अगले ही दिन परमिट एक्सटेंशन मंज़ूर कर दी — एक ईमेल में अफसर ने लिखा: “जल्दी करो, नाम देख लो।”
व्हाइट हाउस ने कहा — “कोई हितों का टकराव नहीं।” रिलायंस ने कहा निवेश पूरी तरह व्यावसायिक आधार पर है। ट्रंप जूनियर के प्रवक्ता ने उन्हें “महज़ एक पैसिव अल्पमत निवेशक” बताया।
एनर्जी अर्थशास्त्री इस रिफाइनरी के कभी बनने पर संदेह जताते हैं। लेकिन ProPublica की यह जांच एक बड़ा सवाल छोड़ती है — क्या अंबानी का पैसा, ट्रंप परिवार की हिस्सेदारी और अमेरिकी नीति में बदलाव महज़ इत्तेफाक है?
📌 Sources & References
- ProPublica (9 जून 2026)
- Maktoob Media



