
जबलपुर। हाजी अब्दुल रज्जाक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने याचिका पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि सीधे रिट क्षेत्राधिकार से रिहाई संभव नहीं है, इसके लिए सक्षम अदालत में नियमित जमानत याचिका दायर करनी होगी। हाजी अब्दुल रज्जाक ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की कार्रवाई को चुनौती देते हुए अपनी हिरासत को अवैध बताया था और राजनीतिक द्वेष के तहत मामले दर्ज किए जाने के गंभीर आरोप लगाए थे।
रासुका की बार-बार कार्रवाई और सलाहकार बोर्ड द्वारा निरस्तीकरण
हाजी अब्दुल रज्जाक की ओर से अदालत में यह महत्वपूर्ण तथ्य रखा गया कि राज्य स्तरीय सलाहकार बोर्ड ने उन पर 3 बार लगाए गए रासुका के आदेशों को अस्वीकार करते हुए रद्द कर दिया था। इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पुराने और नए मामलों को आधार बनाकर उन्हें लगातार हिरासत में रखा गया। याचिका में इसे संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन और द्वेषपूर्ण कार्रवाई की एक सुनियोजित श्रृंखला बताया गया।
न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत — जेल नहीं, बेल
सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने स्वयं यह स्वीकार किया कि भारतीय न्याय प्रणाली जेल नहीं बल्कि बेल के सिद्धांत पर आधारित है। अदालत ने रज्जाक को नियमित जमानत के लिए सक्षम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे उनके कानूनी अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं।
हाईकोर्ट ने पुलिस-प्रशासन को कड़ी फटकार और निर्देश
अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को सख्त निर्देश जारी किए:
- यदि रज्जाक के खिलाफ कोई भी नया मामला दर्ज हो तो 24 घंटे के भीतर उन्हें और उनके परिजनों को सूचित करना अनिवार्य होगा।
- उनके विरुद्ध दर्ज सभी लंबित मुकदमों की सूची सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए।
- सीसीटीएनएस (Crime and Criminal Tracking Network & Systems) प्रणाली के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
हाईकोर्ट के ये निर्देश स्पष्ट रूप से रज्जाक और उनके परिवार के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। अब वे सक्षम न्यायालय में नियमित जमानत याचिका दायर कर अपनी रिहाई का रास्ता खोल सकते हैं।



