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भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामला: AIMPLB और जमात-ए-इस्लामी हिंद ने हाईकोर्ट के फैसले पर जताई कड़ी चिंता । सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी, कहा – संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक आज़ादी से जुड़ा है मामला

नई दिल्ली/भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले में आए हालिया फैसले के बाद मुस्लिम संगठनों की तरफ से प्रतिक्रिया सामने आनी शुरू हो गई है। All India Muslim Personal Law Board (ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) और Jamaat-e-Islami Hind (जमात-ए-इस्लामी हिंद) ने फैसले पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।

AIMPLB ने फैसले को बताया नाकाबिले-कुबूल

AIMPLB ने अपने बयान में कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक तथ्यों और सरकारी रिकॉर्ड के खिलाफ दिखाई देता है। बोर्ड ने कहा कि कमाल मौला मस्जिद कमेटी सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करेगी और इस कानूनी लड़ाई में बोर्ड हर मुमकिन कानूनी और नैतिक मदद देगा।

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‘सदियों पुराने रिकॉर्ड को नजरअंदाज किया गया’

AIMPLB के प्रवक्ता Dr S.Q.R. Ilyas ने कहा कि लंबे समय तक Archaeological Survey of India के रिकॉर्ड और सूचना पट्टों में इस जगह को “भोजशाला/कमाल मौला मस्जिद” के रूप में दर्ज किया जाता रहा, जो दोनों समुदायों के दावों को स्वीकार करने का संकेत था।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2003 में एक व्यवस्था बनाई गई थी, जिसके तहत हिंदू समुदाय को मंगलवार को पूजा और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी। उनके अनुसार यह साझा धार्मिक व्यवस्था थी, जिसे अब खत्म कर दिया गया है।

‘मस्जिद सिर्फ इमारत नहीं, हमारी तारीख और पहचान से जुड़ी है’

बोर्ड ने कहा कि मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत में यह बात रखी गई थी कि सरकारी राजस्व रिकॉर्ड लगातार इस ढांचे को मस्जिद के रूप में दर्ज करते रहे हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि केवल पुराने स्थापत्य अवशेषों की मौजूदगी किसी स्थल की मौजूदा धार्मिक पहचान का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकती।

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जमात-ए-इस्लामी हिंद ने भी जताई चिंता

Jamaat-e-Islami Hind के अध्यक्ष Syed Sadatullah Husaini ने कहा कि इस फैसले का असर केवल एक विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे न्याय व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और मुल्क के सामाजिक माहौल पर भी असर पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 सभी नागरिकों को धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा देते हैं और वर्षों से चली आ रही साझा व्यवस्था को बदलना गंभीर चिंता का विषय है।

Places of Worship Act का भी किया जिक्र

जमात-ए-इस्लामी हिंद ने कहा कि Places of Worship Act 1991 का मकसद आजादी के समय मौजूद धार्मिक स्थलों की स्थिति को बरकरार रखना था। संगठन ने कहा कि इस कानून की भावना को कायम रखना देश में अमन, भाईचारे और सामाजिक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई जारी रखने का ऐलान

दोनों संगठनों ने कहा है कि प्रभावित पक्ष संविधान के दायरे में रहते हुए सभी कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में मामले के सभी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई होगी और सभी पक्षों की बात सुनी जाएगी।

नोट: यह खबर संबंधित संगठनों द्वारा जारी बयानों और प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। मामले का कानूनी पक्ष अभी आगे की न्यायिक प्रक्रिया में विचाराधीन है।

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