बालाघाट में 31 बच्चों की मौत — अस्पताल 40 किमी दूर, रास्ता 4 किमी पहले खत्म

बालाघाट | BAZ Media Bhopal Division । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी परिवारों के लिए 4 किलोमीटर की दूरी मौत और जिंदगी के बीच की दूरी बन गई है। मलेरिया और खसरे से अब तक 31 बच्चों की मौत हो चुकी है। 10 साल के गजेंद्र अरकम की मौत इस हकीकत को बयां करती है — जब तक एंबुलेंस आई, रास्ता खत्म हो चुका था। जब तक बच्चे को उठाकर ले गए, वक्त निकल चुका था। जब तक अस्पताल पहुंचे, बच्चा बच नहीं पाया।
News in Short
- बालाघाट के बैगा गांवों में मलेरिया-खसरे से 31 बच्चों की मौत
- गांव तक सड़क नहीं — आखिरी 3-4 किमी पैदल या कच्चे रास्ते से
- नजदीकी अस्पताल 40 किमी दूर, सोनगुड़दा में सिर्फ 2-3 डॉक्टर
- परिवार हिंदी-अंग्रेजी नहीं समझते, गोंडिया रेफर होने से डरते हैं
- एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंचती, वाहन नहीं तो झाड़-फूंक ही इलाज
4 किमी की दूरी, 2 घंटे का इंतज़ार और एक मौत
बैहर तहसील के अतरिया गांव में 10 साल के गजेंद्र अरकम को तेज बुखार आया। मलेरिया और खसरे का अटैक था। परिवार ने एंबुलेंस बुलाई। 2 घंटे बाद एंबुलेंस आई — लेकिन गांव तक नहीं। सड़क गांव से 3-4 किमी पहले खत्म हो जाती है। परिवार बच्चे को उठाकर उस जगह तक पहुंचा, जहां एंबुलेंस खड़ी थी। फिर अस्पताल की तरफ निकले। लेकिन तब तक गजेंद्र की हालत बिगड़ चुकी थी। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते वो बच नहीं पाया।
गजेंद्र 31वां बच्चा था जो इन इलाकों में मलेरिया या खसरे से मर गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक उससे पहले 30 बच्चे और मर चुके थे। ये मौतें रुकी नहीं हैं। वजह बीमारी से ज्यादा वो 4 किमी की दूरी है जो गांव और इलाज के बीच खाई बन गई है।
अस्पताल 40 किमी दूर, डॉक्टर 2-3, सुविधाएं शून्य
बैगा गांवों से नजदीकी अस्पताल करीब 40 किलोमीटर दूर हैं। सोनगुड़दा के अस्पताल में स्थानीय लोगों के मुताबिक सिर्फ 2-3 डॉक्टर हैं। सुविधाएं नाकाफी हैं। मचुरधा के अस्पताल में सिर्फ 1 डॉक्टर है। बालाघाट जिला अस्पताल भी गंभीर केसों को संभाल नहीं पाता।
एक 10 साल के दूसरे बच्चे को बालाघाट जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत बिगड़ी तो डॉक्टरों ने उसे गोंडिया (महाराष्ट्र) रेफर कर दिया। लेकिन माता-पिता गोंडिया जाने से डरे। वो पहले ही अपने गांव से 120 किमी दूर आ चुके थे। उन्होंने अपने गांव से बाहर कभी कदम नहीं रखा था। शहर की चकाचौंध, भीड़, गाड़ियां — सब अनजाना था। हिंदी भी ठीक से नहीं आती। डॉक्टरों की अंग्रेजी मेडिकल भाषा तो बिल्कुल नहीं समझ पाते। ऐसे में एक और अनजान शहर, एक और लंबा सफर — उनके लिए बच्चे को ले जाने से डरावना लगा। और जब तक परिवार सोचता रहा, बच्चे की हालत और खराब होती गई।
वाहन नहीं तो झाड़-फूंक, फिर मौत
बैगा समुदाय के सदस्य संपत ने बताया कि उनके परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो चुकी है, जिनमें उनके दो बच्चे भी शामिल हैं। उन्होंने बच्चों को झाड़-फूंक के लिए ले गए थे क्योंकि उनके पास अस्पताल ले जाने के लिए कोई वाहन नहीं था। “हमने उन्हें झाड़-फूंक करवाई, लेकिन अस्पताल ले जाने के लिए हमारे पास कोई गाड़ी नहीं थी,” उन्होंने कहा।
ज्यादातर बैगा परिवारों को समझ नहीं आता कि उनके बच्चों को क्या हुआ है। मलेरिया और खसरे जैसी बीमारियों के लक्षण उन्हें पता नहीं होते। इलाज के लिए वो पारंपरिक तरीके अपनाते हैं। जब तक गंभीरता समझ आती है, बहुत देर हो चुकी होती है। और तब भी अगर गाड़ी नहीं है, सड़क नहीं है, तो अस्पताल पहुंचना नामुमकिन हो जाता है।
बालाघाट के बैगा गांवों में बच्चों की मौतें सिर्फ मलेरिया या खसरे की वजह से नहीं हो रही हैं। असली वजह वो 4 किमी की सड़क है जो कभी बनी नहीं, वो एंबुलेंस है जो गांव तक नहीं पहुंचती, वो अस्पताल हैं जो 40 किमी दूर हैं और वो सरकारी लापरवाही है जो इन परिवारों को मौत और जिंदगी के बीच चुनाव करने पर मजबूर कर रही है।
📌 Sources & References
- The Observer Post



